कोडरमा // देश जहां डिजिटल इंडिया और विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है, वहीं झारखंड के कोडरमा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्था पर कड़े सवाल खड़े करती है। मरकच्चो प्रखंड के घने जंगलों के बीच बसे कारी पहाड़ी और चटनिया दह गांव के लोग आज भी आदिम युग जैसी चुनौतियों से लड़ रहे हैं। न बिजली, न सड़क और न ही पीने का साफ पानी। यहां के ग्रामीण उस पानी को पीने को मजबूर हैं, जिसे देखकर किसी को भी घिन आ जाए।
पानी के लिए आधा किलोमीटर दूर पथरीले रास्ते से पहुंचते हैं जोरिया
कोडरमा-गिरिडीह मुख्य मार्ग के पास, डगरनवां पंचायत का यह इलाका विकास की रोशनी से कोसों दूर है। यहां के 10 परिवारों के करीब 100 लोग पिछले 20 वर्षों से बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। गांव की महिलाएं हर सुबह बर्तन लेकर आधा किलोमीटर दूर पथरीले रास्तों से होकर सोती नाला पहुंचती हैं। तस्वीरें विचलित करने वाली हैं—जिस नाले में जानवर पानी पीते हैं, उसी के किनारे चुआं (छोटा गड्ढा) खोदकर महिलाएं कटोरे से पानी छानती हैं।

ग्रामीण महिला कुफरा देवी : “हम लोग 20 साल पहले यहां आकर बसे थे, तब से यही हाल है। गर्मी में पानी सूख जाता है और बरसात में नाले का गंदा पानी पीना पड़ता है क्योंकि चुआं खोदने की जगह नहीं बचती। प्रशासन से कई बार गुहार लगाई, पर कोई सुनने वाला नहीं।”
मजदूरी और खेती पर निर्भर है ग्रामीण
अंधेरा होने पर यह गांव ‘ढिबरी’ (मिट्टी के तेल का दीया) के भरोसे रहता है। बिजली के तार यहां तक नहीं पहुंचे हैं। दूषित पानी के कारण गांव के बच्चे और बुजुर्ग आए दिन बीमारियों की चपेट में रहते हैं। स्वास्थ्य केंद्र दूर होने के कारण स्थिति और भी भयावह हो जाती है। मजदूरी और खेती कर जीवन यापन करने वाले इन ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया है।
ग्रामीण पुरुष लखन मुर्मू “उसी पनसोता नाले में जानवर पानी पीते हैं और वहीं से हम भी। न पक्की सड़क है, न बिजली। हम आज भी ढिबरी युग में जी रहे हैं। प्रशासन को कई बार बताया, लेकिन आज तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।

सवाल यह है कि जल जीवन मिशन और घर-घर बिजली पहुंचाने के दावों के बीच कारी पहाड़ी के ये 100 लोग सिस्टम की नजरों से ओझल क्यों हैं ? क्या प्रशासन किसी बड़ी महामारी या अनहोनी का इंतजार कर रहा है? अब देखना यह है कि इस खबर के बाद जिला प्रशासन की नींद टूटती है या नहीं।
