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Online Game। मौत का कारण बनते ऑनलाइन गेम -

Online Game। मौत का कारण बनते ऑनलाइन गेम

कोरियन लवर गेम के चलते गाजियाबाद की तीन बहनों की खुदकुशी ने आज के हालात और बच्चों की बदलती मानसिकता को लेकर झकझोर कर रख दिया है। अभी तीन बहनों की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई कि ऑनलाइन गेम के चलते मेरठ का 22 वर्षीय युवक मोहम्मद कैफ हेडफोन लगाकार गेम खेलते खेलते ही बेहोश होकर गिर गया और ब्रेन हेमरेज होने से मौत के आगोश में समा गया। इसे इंटरनेट गेमिंग डिसआर्डर के रुप में देखा व समझा जा सकता है।

फायर-फायर चिल्लाने की लत….

इस तरह की घटनाएं देश-दुनिया में आये दिन हो रही है और इनमें से कुछ ही घटनाएं हमारे सामने आ पाती है। ऐसा नहीं है कि ऑनलाइन गेम की गिरफ्त में हमारे देश के बच्चे या युवा आ रहे हों अपितु दुनिया के अधिकांश देश इस समस्या से दो-चार हो रहे हैं। इस तरह की घटनाओं को हत्या के रुप में ही देखा जाना चाहिए। आत्महत्या कहकर इसे हल्का किया जा रहा है। हालात यहां तक है कि बच्चे या ऑनलाइन गेम खेलने वाले रात को सोने की स्थिति में गेम में चल रहे टास्क से संबंधित बातें बोलते हुए देखे जा सकते हैं। पिछले दिनों ऑनलाइन गेम से ग्रसित बच्चे द्वारा नींद में फायर-फायर चिल्लाने का समाचार आम होता देखा गया। दरअसल, ऑनलाइन गेम मनोस्थिति को इस कदर प्रभावित कर देते हैं कि उठते-बैठते टास्क ही टास्क दिमाग में घूमता रहा है। इसी कारण से दुनिया के कई देशों में बच्चों के लिए इंटरनेट के उपयोग को लेकर सख्ती या रोक जैसे कदम उठाने शुरु किये हैं।

आस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिट्रेन, सिंगापुर दक्षिण कोरिया आदि देश इस दिषा में सक्रिय हुए हैं।दरअसल, देखा जाएं तो आनलाइन गेम की लत अन्य नशों से भी अधिक गंभीर होती जा रही है। माना जाता है कि दुनिया के देशों में 1982 में आनलाइन गेमिंग के चलते पहली मौत का मामला सामने आया था जबकि उस समय तो इंटरनेट की पहुंच एक प्रतिशत तक भी नहीं थी। 2022 के बाद ऑनलाइन गेमों की बाढ़ सी आ गई और भारत ही नहीं दुनिया के देशों में गेमिंग के चलते होने वाले दुष्प्रभावों से हिला कर रख दिया है।

कोविड के साइड इफेक्ट या ऑनलाइन गेमिंग के चस्के

देखा जाए तो जहां तक बच्चों में ऑनलाइन गेमिंग के चस्के का प्रमुख कारण माना जाए तो इसे कोविड के साइड इफेक्ट के रुप में देखा जा सकता है। कोविड के चलते बच्चों की जिस तरह से ऑनलाइन कक्षाएं शुरु हुई और जिस तरह से आज भी इसे देखा जा सकता है तो बच्चों के हाथों में एंड्रायड़ फोन आने और ऑनलाइन कक्षाओं के बाद स्क्रिन की अवधि बढ़ने और आकर्षक भ्रमित करने वाले गेमों से बच्चों के जुड़ने से हालात दिन-प्रतिदिन खराब ही हुए हैं। इस लत में बच्चे ही नहीं अपितु युवा भी आते जा रहे हैं। ब्लू व्हेल चैलेंज, पबजी, चोकिंग गेम, फार्टनाइट, फ्री फायर, पपी प्ले टाइम, द बेबी इन येलो, एविल नन, आइसक्रीम आदि गेम ने सर्वाधिक प्रभावित किया है।

ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया मुख्यतौर से दो दिशाओं में चलती है।

ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया मुख्यतौर से दो दिशाओं में चलती है। एक टास्कबेस्ड गेम है तो दूसरे इमर्सिंव गेम है। टास्कबेस्ड गेम में लगातार नए नए टास्क दिए जाते हैं। यहां तक कि ऐसा भी गया है कि इस तरह के गेम में कई बार तो खेलने वाले को स्वयं को नुकसान पहुंचाने वाले टास्क दे दिए जाते हैं। वाइल्ड हंट, विचर 3, होरिजोन जैसे इस तरह के अनेक गेम है। यह तो केवल उदाहरण मात्र है। इसी तरह से इमर्सिंग गेमों में तकनीक और ग्राफिक्स के माध्यम से यर्थाथ दुनिया जैसे हालात दिखाते हैं। जीरो डॉन, रेड डेड, फॉलआउट और इसी तरह के अनेक गेम उपलब्ध है। खतरनाक तथ्य यह है कि 10-12 से लेकर 40 वर्ष तक के लोग इनके ज्यादा शिकार हो रहे हैं।ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया की बात करें तो यह अपने आप में बड़ा व्यापार है। 2024 में 3.7 बिलियन के कारोबार को माना जा रहा है। साल 2029 तक इसके 9.1 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

यानी 2029 तक लगभग तीन गुणा बढ़ जाएगा। सबसे बड़ी चिंतनीय बात यह है कि ऑनलाइन गेम के कारण भले ही मौत के समाचार कभी कभार ही सामने आते हो पर इससे ज्यादा गंभीरता यह है कि मनोवैज्ञानिक असर अधिक दिखाई देने लगा है। ऑनलाइन गेम के लत वालों में डर, अकेलापन, अनिंद्रा, खुद को नुकसान पहुंचाने के साथ ही शारीरिक और मानसिक विकार आम होते जा रहे हैं। कुंठा, आक्रोश, संवेदनहीनता, तनाव आम होते जा रहे हैं।

परिजनों को निरंतर निगरानी रखने की जरूरत…

समय आ गया है जब ऑनलाइन गेमिंग की समस्या का हल खोजा ही जाना चाहिए। अन्यथा हालात दिन-प्रतिदिन बद से बदतर ही होंगे। ऑनलाइन गेमिंग बनाने वालों को तो एक मात्र उद्देश्य अधिक से अधिक पैसा कमाना है उन्हें इसके दुष्प्रभावों से कोई लेना-देना नहीं होता। हालांकि भारत सहित कुछ देशों की सरकारें सक्रिय हुई है। पर मनोवैज्ञानिकों को भी आगे आकर कोई समाधान खोजना होगा वहीं अभिभावकों, परिजनों व समाज का भी दायित्व हो जाता है। परिजनों को निरंतर निगरानी रखने, मोबाइल देखने की समय सीमा तय करने, किसी और रचनात्मक कार्य में लगाने, सामाजिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय करने और परंपरागत आउट डोर गेम्स के प्रति रुचि पैदा करने के ठोस प्रयास करने ही होंगे। सरकार को भी मौत की राह में ले जाने वाले गेम फॉरमेट पर रोक लगाने के सख्त कदम उठाने होंगे। (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा , लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैंं।)

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