झारखंड की आवाज

सोनम वांगचुक मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने की बहस -

सोनम वांगचुक मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने की बहस

नई दिल्ली // उच्चतम न्यायालय ने जोधपुर जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि वो लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को हिरासत के दौरान दी गई पेन ड्राइव सीलबंद कर कोर्ट में दाखिल करें। उच्चतम न्यायालय ने इस बात का संदेह जताया कि केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक के भाषणों से संबंधित जो ट्रांसक्रिप्ट दी है उसके अनुवाद में काफी फर्क है। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी को करने का आदेश दिया।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि सोनम वांगचुक के भाषणों के ट्रांसक्रिप्ट में कई वैसे शब्द हैं जो उन्होंने कहा ही नहीं। तब कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि आपने जो सूची सौंपी है उसमें हिरासत के आदेश का जिक्र ही नहीं है। कम से कम वांगचुक के भाषणों का सही ट्रांसक्रिप्ट तो होना ही चाहिए। तब एएसजी केएम नटराज ने कहा कि एक विभाग ने किया है। हम इसके विशेषज्ञ नहीं हैं। तब कोर्ट ने कहा कि आज के आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के दौर में 98 फीसदी सही होने की गुंजाइश है। तब सिब्बल ने कहा कि हिरासत में लेने वाल ने उस पर भरोसा किया है जिसका अस्तित्व ही नहीं है।

सुनवाई के दौरान हल्के फुल्के अंदाज में कोर्ट ने कहा कि हमने वो भी सुना जो उन्होंने कहा ही नहीं। इस पर सिब्बल ने कहा कि और जो हम कह रहे हैं उन्होंने सुना ही नहीं। तब कोर्ट ने कहा कि हम सुन रहे हैं ना। इस पर सिब्बल ने कहा कि तभी तो हम यहां आये हुए हैं।बता दें कि केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि उन्हें गिरफ्तार करने के बाद लद्दाख में हिंसा थम गई। केएम नटराज ने कहा था कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद लद्दाख में हिंसा खत्म हो गई थी। हिंसा का खत्म होना ही बताता है कि उनकी गिरफ्तारी सही थी।

8 जनवरी को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चौरी चौरा कांड का जिक्र करते हुए कहा था कि हिंसा के बाद सोनम वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल तत्काल वापस ले लिया था। आपको याद होगा कि गांधीजी ने भी ऐसा ही किया था। जब चौरी चौरा की घटना के बाद हिंसा हुई थी, तो उन्होंने भी बिल्कुल वैसा ही किया था। सिब्बल ने कहा कि हिरासत में लेने के 28 दिन बाद उनको हिरासत में लेने के आधार बताए गए जो कानूनी समय-सीमा का साफ उल्लंघन है। सिब्बल ने कहा कि कानून यह है कि जिन दस्तावेजों के आधार पर हिरासत में लिया गया है अगर आरोपी को उपलब्ध नहीं किया जाता है, तो हिरासत का आदेश रद्द हो जाता है। उच्चतम न्यायालय ने अपने कई फैसलों में यह बात कही है।

Leave a Reply