नई दिल्ली // उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने आज अहम फैसला सुनाते हुए करीब 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े रहने को मजबूर गाजियाबाद के हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने 100 फीसदी दिव्यांगता के शिकार हरीश राणा के मेडिकल ट्रीटमेंट को हटाने की इजाजत दे दी ।
शांति से मौत का अधिकार संविधान की धारा 21 के तहत जीने के अधिकार का हिस्सा है
उच्चतम न्यायालय ने एम्स को निर्देश दिया कि मरीज को पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाए, ताकि चिकित्सा उपचार को उचित तरीके से हटाया जा सके। मरीज की गरिमा भी बनी रहे। उच्चतम न्यायालय ने इच्छा मृत्यु पर विस्तृत कानून लाने की भी अनुशंसा की है। दरअसल, अपने 32 वर्षीय बेटे के ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके हरीश के माता-पिता ने ही उसके लिए इच्छा मृत्यु की मांग की थी। इस प्रक्रिया में मरीज को जीवित रखने वाले आर्टिफिशियल सपोर्ट को हटाकर उसे मरने दिया जाता है।
उच्चतम न्यायालय ने 09 मार्च, 2018 को पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इच्छा मृत्यु के वसीयत की अनुमति देते हुए कहा था कि हर व्यक्ति को सम्मान के साथ मौत का अधिकार है। संविधान पीठ ने माना था कि शांति से मौत का अधिकार संविधान की धारा 21 के तहत जीने के अधिकार का हिस्सा है ।
