
नई दिल्ली // उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को पलट दिया है, जिसमें किसी महिला के पायजामे की डोरी खोलना दुष्कर्म का प्रयास नहीं, बल्कि दुष्कर्म की तैयारी माना गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस विवादास्पद फैसले को रद्द करते हुए कहा कि किसी महिला के पायजामे की डोरी खोलना दुष्कर्म का प्रयास है।
उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता लाने के लिए समिति को एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश भी जारी किए। कोर्ट ने जुडिशियल एकेडमी के निदेशक जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाने का अनुरोध किया। ये कमेटी यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में जजों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता कैसे लाई जाए इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ये विवादास्पद फैसला 17 मार्च 2025 का है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कासगंज के ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलटते हए कहा था कि किसी पीड़िता का प्राईवेट पार्ट छूना और उसकी सलवार का नाड़ा तोड़ना दुष्कर्म या दुष्कर्म की कोशिश नहीं माना जाएगा बल्कि ये एक गंभीर यौन उत्पीड़न माना जाएगा। कासगंज के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर दो आरोपितों को शुरु में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और पॉक्सो एक्ट की दारा 18 के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलटते हुए आरोपितों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 354बी और पॉक्सो एक्ट की धारा 9 और 10 के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया था। उच्च न्यायालय के इस फैसले की सोशल मीडिया पर काफी आलोचना हुई थी। हि.स.
