रांची/गुमला। झारखंड की आदिवासी नेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता निशा कुमारी भगत के असामयिक निधन से राज्य के सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में शोक की लहर है। आदिवासी समाज की पहचान, सरना धर्म, जल-जंगल-जमीन और जनजातीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहने वाली निशा भगत ने सामाजिक आंदोलन से लेकर चुनावी राजनीति तक अपनी अलग पहचान बनाई थी। 6 नवंबर 2026 को रांची के पिठोरिया थाना क्षेत्र में उनकी मौत की खबर सामने आई। मौत से पहले सोशल मीडिया पर प्रसारित उनके फेसबुक लाइव वीडियो ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
निशा भगत की मौत के बाद उनके राजनीतिक जीवन, सामाजिक संघर्ष और विभिन्न संगठनों से जुड़े सफर की चर्चा भी तेज हो गई है।
कांग्रेस से शुरू हुई थी राजनीतिक पारी
निशा भगत ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी। दिसंबर 2023 में वह कांग्रेस के शक्ति सुपर शी अभियान से जुड़ी थीं। इस दौरान उन्होंने झारखंड में स्टेट कोऑर्डिनेटर और प्रदेश युवा कांग्रेस की उपाध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई थी।
कांग्रेस से जुड़ने के बाद उन्होंने आदिवासी समाज और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी सक्रियता बढ़ाई। हालांकि, बाद में उन्होंने कांग्रेस से दूरी बनाकर झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की।
JLKM में शामिल होकर 2024 में गुमला से लड़ा विधानसभा चुनाव
कांग्रेस के बाद निशा भगत झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) से जुड़ीं। वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें गुमला विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने JLKM के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सकीं।
चुनाव के बाद भी वह आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात रखती रहीं। वर्ष 2025 में कुड़मी-महतो समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग के विरोध सहित कुछ मुद्दों पर पार्टी के साथ उनके मतभेद सामने आए। इसके बाद JLKM ने उन्हें छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था।
होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद सामाजिक कार्यों में जुटीं
निशा भगत मूल रूप से गुमला जिले की रहने वाली थीं। उन्होंने दुर्गापुर स्थित डीएसएमएस संस्थान से पढ़ाई पूरी करने के बाद होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया था। इसके बाद बेंगलुरु में नौकरी भी की, लेकिन कुछ समय बाद नौकरी छोड़कर अपने गृह क्षेत्र लौट आईं और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हो गईं।
उनके पिता हंदू भगत भी झारखंड आंदोलन से जुड़े रहे हैं। पिता के सामाजिक और आंदोलनकारी जीवन का प्रभाव निशा की विचारधारा और कार्यशैली में भी दिखाई देता था।
सरना धर्म और आदिवासी अस्मिता के मुद्दे पर रहीं मुखर
निशा भगत की सामाजिक सक्रियता का प्रमुख केंद्र आदिवासी समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान थी। वह सरना धर्म कोड, सरना झंडा, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा, सीएनटी-एसपीटी कानून और पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे विषयों को उठाती थीं।
सितंबर 2025 में उन्हें केंद्रीय सरना समिति की केंद्रीय महिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। इस भूमिका में उन्होंने आदिवासी महिलाओं को संगठित करने और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम किया।
दिसंबर 2025 में धर्मांतरण और डीलिस्टिंग के मुद्दे पर विरोध दर्ज कराने के लिए उन्होंने मुंडन भी कराया था। इस घटना के बाद वह एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में आई थीं।
मौत से पहले फेसबुक लाइव में बताई अपनी परेशानी
6 नवंबर को मौत से पहले निशा भगत फेसबुक पर लाइव आई थीं। करीब 10 से 11 मिनट के इस वीडियो में वह भावुक होकर अपनी परेशानी बताती नजर आईं। उन्होंने घर में कथित चोरी, बदनामी और पुलिस-प्रशासन से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने को लेकर सवाल उठाए।
लाइव के दौरान उन्होंने जमीन से जुड़े विवादों और कुछ लोगों पर गंभीर आरोप भी लगाए। खबर यह भी है कि उन्होंने पिठोरिया थाना प्रभारी से फोन पर बात करते हुए अपनी स्थिति और परेशानी का जिक्र किया था।
वीडियो सामने आने के बाद घटना को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, फेसबुक लाइव में लगाए गए आरोपों की सत्यता पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
पिता ने मांगी उच्चस्तरीय जांच
निशा भगत की मौत के बाद उनके पिता हंदू भगत ने पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने सीबीआई जांच कराने की मांग उठाते हुए अपनी बेटी की मौत से जुड़े सभी पहलुओं की गहराई से पड़ताल करने की अपील की है।

वहीं, झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (प्रथम मुख्यमंत्री) बाबूलाल मरांडी ने निशा भगत के पैतृक आवास पहुंचकर परिजनों से मुलाकात की। विपक्षी नेताओं और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।
पुलिस के अनुसार, पिठोरिया थाना क्षेत्र में हुई घटना के बाद अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर जांच की जा रही है। घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए गए हैं और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित अन्य तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
राजनीतिक सफर पर एक नजर
- दिसंबर 2023: कांग्रेस के शक्ति सुपर शी अभियान की झारखंड स्टेट कोऑर्डिनेटर और प्रदेश युवा कांग्रेस की उपाध्यक्ष के रूप में सक्रिय।
- वर्ष 2024: झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के टिकट पर गुमला विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा।
- वर्ष 2025: JLKM से छह वर्षों के लिए निष्कासित।
- सितंबर 2025: केंद्रीय सरना समिति की केंद्रीय महिला अध्यक्ष बनीं।
- दिसंबर 2025: डीलिस्टिंग और धर्मांतरण के मुद्दे पर मुंडन कराकर विरोध दर्ज कराया।
- 6 नवंबर 2026: रांची के पिठोरिया थाना क्षेत्र में निधन।
निशा भगत का जीवन सामाजिक सक्रियता, आदिवासी अधिकारों की आवाज और राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा रहा। उनकी मौत ने झारखंड में जमीन विवाद, आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा और पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। अब परिजनों के साथ-साथ समाज की निगाहें जांच के नतीजों पर टिकी हैं।
नोट: इस समाचार में मौत से संबंधित आरोपों को संबंधित व्यक्तियों के आरोप के रूप में प्रस्तुत किया गया है। किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी जांच और आधिकारिक निष्कर्ष के बाद ही तय होगी।
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