बैद्यनाथधाम । Bkd News Jharkhand।
सावन का महीना और बाबा बैद्यनाथ धाम की अद्भुत आस्था
देवघर // सावन का महीना शुरू होते ही पूरा देश शिवमय हो जाता है। “बोल बम”, “हर-हर महादेव” और “बाबा नगरी” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। इसी दौरान झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला आयोजित होता है, जहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु जलार्पण के लिए पहुंचते हैं।

सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी करने वाले कांवड़िए जब बाबा बैद्यनाथ के दरबार में पहुंचते हैं, तो उनकी महीनों की तपस्या पूर्ण होती है। यह यात्रा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन, सेवा और समर्पण का अद्भुत संगम है।
कांवड़ यात्रा की शुरुआत कब हुई ?
कांवड़ यात्रा का कोई निश्चित ऐतिहासिक वर्ष उपलब्ध नहीं है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसकी परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है।
मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष का पान भगवान शिव ने किया था। उनके ताप को शांत करने के लिए देवताओं ने गंगाजल से जलाभिषेक किया। यही परंपरा आगे चलकर कांवड़ यात्रा के रूप में प्रसिद्ध हुई।

देवघर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की और सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक किया। तभी से इस मार्ग की धार्मिक महत्ता और अधिक बढ़ गई।
बाबा बैद्यनाथ धाम क्यों है विशेष?
बाबा बैद्यनाथ धाम को भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। साथ ही इसे 51 शक्तिपीठों में भी विशेष स्थान दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां भगवान शिव और माता शक्ति दोनों का दिव्य स्वरूप एक साथ विराजमान है, इसलिए इस धाम का महत्व अन्य तीर्थों की तुलना में और भी बढ़ जाता है।
यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष करोड़ों श्रद्धालु बाबा के दर्शन और जलाभिषेक के लिए देवघर पहुंचते हैं।
सुल्तानगंज से ही गंगाजल क्यों लाया जाता है?
बिहार के सुल्तानगंज में गंगा उत्तरवाहिनी (उत्तर दिशा की ओर बहने वाली) है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां से भरा गया गंगाजल अत्यंत पवित्र माना जाता है। श्रद्धालु इसी जल को कांवड़ में लेकर लगभग 105 किलोमीटर पैदल यात्रा करते हुए बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं और शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं।
श्रावणी मेले में जलार्पण की व्यवस्था कैसे होती है ?
श्रावणी मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं।

मेले के दौरान स्पर्श पूजा (शिवलिंग को हाथ लगाकर पूजा) की अनुमति नहीं रहती। सभी श्रद्धालु अरघा व्यवस्था के माध्यम से जलार्पण करते हैं, ताकि लाखों भक्त सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से बाबा पर जल अर्पित कर सकें।

भीड़ प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए दो अरघा संचालित किए जाते हैं, एक अरघा जिसके माध्यम से श्रद्धालु जलार्पण के साथ बाबा का दर्शन भी कर सकते हैं मंदिर के मुख्य द्वार पर अरघा लगाया जाता है।

अरघा में जलार्पण के साथ ही बाबा पर जलार्पण हो जाता है वही एक बाह्य (Outer) अरघा भी शामिल होता है। इसमें जलार्पण के लिए लाइन मुख्य द्वार वाले अरघा के तुलना में इसमें भीड़ कम होती है इस अरघा को मंदिर प्रांगण में लगाया जाता है जहां जलार्पण के साथ बाबा का दर्शन नहीं हो पाता है। मंदिर के ऊपर लगे एलईडी स्क्रीन के माध्यम से जलार्पण को देख सकते हैं। इससे जलार्पण की प्रक्रिया अधिक सुचारु और तेज हो जाती है।
शीघ्र दर्शनम कूपन क्या है ?
बाबा मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए शीघ्र दर्शनम की व्यवस्था उपलब्ध रहती है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार सामान्य दिनों में शीघ्र दर्शनम कूपन का शुल्क ₹300 है। श्रावणी मेला के दौरान इसका शुल्क ₹600 निर्धारित किया जाता है। पूर्व में यह शुल्क क्रमशः ₹250 और ₹500 था, जिसमें पिछले वर्ष संशोधन किया गया। (शुल्क एवं व्यवस्था समय-समय पर मंदिर प्रशासन द्वारा परिवर्तित की जा सकती है।)
बोलबम कितने प्रकार के होते हैं ?
श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार अलग-अलग प्रकार से यात्रा करते हैं।
- 1. साधारण बोलबम सबसे अधिक श्रद्धालु इसी प्रकार की यात्रा करते हैं। वे सामान्य गति से पैदल चलकर जल लेकर बाबा धाम पहुंचते हैं। सालों भर बाबा पर जलार्पण के लिए श्रद्धालु आते हैं। इसमें अधिकतर श्रद्धालु तीन दिन में अपनी यात्रा को पूरा करते हैं।
- 2. डाक बम डाक बम बिना रुके तेज गति से दौड़ते हुए यात्रा पूरी करते हैं। इनका संकल्प होता है कि गंगाजल भरने के बाद बिना विश्राम किए सीधे बाबा के दरबार पहुंचेंगे। 24 घंटे के अंदर बाबा पर जलार्पण करना । इसकी संख्या सावन माह में अधिक होती है बाकी दिनों में नहीं के बराबर आते हैं क्योंकि सावन में डाक बम के लिए सुविधाएं रहती है बाकी दिनों में नहीं होती है।
- 3. दंडी बम दंडी बम पूरी यात्रा दंडवत प्रणाम करते हुए पूरी करते हैं। यह अत्यंत कठिन साधना मानी जाती है। इसकी यात्रा में महीनों से अधिक का समय लगता है
कांवड़ यात्रा के प्रमुख नियम
- गंगाजल भरने के बाद कांवड़ को अपवित्र नहीं होने देना चाहिए।
- सात्विक भोजन करना चाहिए।
- मांस, मदिरा और नशे से दूर रहना चाहिए।
- ब्रह्मचर्य एवं संयम का पालन करना चाहिए।
- प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए।
- स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए।
- कांवड़ को सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। स्टैंड पर रखना चाहिए
बाबा बैद्यनाथ मंदिर की विशेषता
- भारत के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में शामिल।
- शक्तिपीठ के रूप में भी धार्मिक महत्व।
- श्रावणी मेले में देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
- सुल्तानगंज से देवघर तक लगभग 105 किलोमीटर की प्रसिद्ध कांवड़ यात्रा।
- पूरे श्रावण मास में “बोल बम” के जयघोष से गूंजती बाबा नगरी।
श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें। अधिकृत स्थान से ही गंगाजल भरें। लाइन तोड़ने या धक्का-मुक्की से बचें। बुजुर्गों एवं महिलाओं की सहायता करें। साफ-सफाई बनाए रखें। अफवाहों पर ध्यान न दें। कोई भी सहायता सुविधा के लिए जिला प्रशासन के द्वारा लगाए जाने वाले सहायत केंद्र से और आधिकारिक अकाउंट से प्राप्त करें।

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