झारखंड की आवाज

सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से क्या होगा? मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा में उठाया बड़ा सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से क्या होगा ? मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा में उठाया बड़ा सवाल

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन प्रतिनिधित्व का क्या ?

राज्यसभा में मेनका गुरुस्वामी ने उठाया बड़ा सवाल

पहली संसदीय स्पीच में न्यायपालिका पर फोकस; महिला और क्वीयर जजों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत बताई

नई दिल्ली // सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की चर्चा के बीच राज्यसभा में वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद मेनका गुरुस्वामी ने न्यायपालिका के भीतर प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाकर बहस को एक नया आयाम दे दिया। उन्होंने सवाल किया कि अदालत में पदों की संख्या बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह देखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन पदों पर नियुक्त होने वाले जज समाज की विविधता को कितना प्रतिबिंबित करते हैं।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now

6 अगस्त 2026 को राज्यसभा में अपने पहले भाषण के दौरान गुरुस्वामी ने विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं और क्वीयर समुदाय के प्रतिनिधित्व की ओर ध्यान खींचा। उन्होंने बताया कि शीर्ष अदालत में जजों की संख्या 37 तक पहुंचने जा रही है, लेकिन महिला जजों की संख्या अभी भी काफी कम है।

जजों की संख्या बढ़ी, फिर भी महिला प्रतिनिधित्व कम

सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने को न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते मुकदमों के बोझ से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। लेकिन गुरुस्वामी ने इस बहस के साथ एक दूसरा सवाल जोड़ दिया—नई नियुक्तियों में महिलाओं और अन्य कम प्रतिनिधित्व वाले वर्गों की हिस्सेदारी कितनी होगी ?

उन्होंने अपने भाषण में कहा कि पिछले आठ वर्षों के दौरान सुप्रीम कोर्ट में केवल तीन महिला जजों की नियुक्ति हुई है। उनके मुताबिक, यह आंकड़ा बताता है कि न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर लैंगिक प्रतिनिधित्व अभी भी पर्याप्त नहीं है।

‘सिर्फ पद बढ़ाने से नहीं बनेगी समावेशी न्यायपालिका’

गुरुस्वामी की बात का मुख्य केंद्र न्यायपालिका में विविधता रहा। उनका जोर इस बात पर था कि अदालतें समाज के हर हिस्से के अनुभवों और दृष्टिकोणों से जुड़ी हों।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में महिला और क्वीयर जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत बताई। यह मुद्दा इसलिए भी खास है क्योंकि न्यायपालिका में नियुक्तियां लंबे समय से योग्यता, वरिष्ठता और न्यायिक अनुभव जैसे मानकों के साथ-साथ प्रतिनिधित्व के सवालों को लेकर भी चर्चा में रही हैं।गुरुस्वामी का हस्तक्षेप इसी बहस को व्यापक बनाता है। उनका संदेश यह है कि न्यायपालिका को मजबूत बनाने की प्रक्रिया में केवल कितने जज होंगे यह सवाल नहीं, बल्कि कौन जज बन रहे हैं यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।

जजों की नियुक्ति और कॉलेजियम पर फिर चर्चा

भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम व्यवस्था लंबे समय से सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय रही है। ऐसे में राज्यसभा में गुरुस्वामी द्वारा न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया जाना नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस से भी जुड़ता है।

गौरतलब है कि गुरुस्वामी खुद सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता रही हैं और संवैधानिक मामलों में उनकी लंबी कानूनी भूमिका रही है। 2018 में धारा 377 से जुड़े ऐतिहासिक मामले में भी उन्होंने याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी की थी।

पहली स्पीच में अपने ही पेशे से जुड़े मुद्दे पर बोलीं

राज्यसभा सांसद के तौर पर गुरुस्वामी का यह पहला बड़ा भाषण था। खास बात यह रही कि उन्होंने अपनी संसदीय पारी की शुरुआत उस क्षेत्र से जुड़े मुद्दे को उठाकर की, जिसमें वह वर्षों से सक्रिय रही हैं।

2026 में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें पश्चिम बंगाल से राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया था। वह निर्विरोध निर्वाचित हुईं और अप्रैल 2026 में उन्होंने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली।

क्वीयर समुदाय से संसद तक का सफर

मेनका गुरुस्वामी देश की चर्चित संवैधानिक वकीलों में शामिल हैं। धारा 377 मामले में उनकी भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद LGBTQ अधिकारों और संवैधानिक स्वतंत्रता की बहस में उनका नाम प्रमुखता से सामने आया।

राज्यसभा पहुंचने के बाद अब उन्होंने न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व का मुद्दा संसद के भीतर उठाया है। इस लिहाज से उनकी पहली स्पीच उनके कानूनी करियर और संसदीय भूमिका के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखी जा सकती है।

अब बहस सिर्फ ‘कितने जज’ पर नहीं, ‘कौन जज’ पर भी

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का फैसला न्यायिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में है। लेकिन गुरुस्वामी के सवाल ने इस प्रक्रिया के साथ प्रतिनिधित्व के पहलू को भी जोड़ दिया है।

आने वाले समय में जब नई नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, तब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट की बढ़ी हुई न्यायिक क्षमता में महिलाओं और अन्य कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों की भागीदारी कितनी बढ़ती है।

मेनका गुरुस्वामी का राज्यसभा में संदेश साफ है—न्यायपालिका को मजबूत बनाने के लिए सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि विविधता भी जरूरी है।

Leave a Reply