नई दिल्ली। गिरफ्तारी की प्रक्रिया और आरोपी के संवैधानिक अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। Jaskaran Jeet Singh Deol बनाम State of Punjab मामले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) लिखित रूप में उपलब्ध कराना संवैधानिक आवश्यकता है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 22 के प्रावधानों के उल्लंघन के कारण अवैध घोषित होकर आरोपी को रिहा किया जाता है, तो उसके बाद की कार्रवाई निर्धारित कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप ही होनी चाहिए।
क्या था मामला?
मामला पंजाब के एसएएस नगर क्षेत्र की एक FIR से जुड़ा था। पुलिस ने 17 मई 2026 को आरोपी को गिरफ्तार किया था और अगले दिन उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट ने पाया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
मजिस्ट्रेट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत प्राप्त अधिकार का उल्लंघन माना और आरोपी की गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए उसे रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले में यह मुद्दा भी उठा कि गिरफ्तारी के दौरान 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने संबंधी संवैधानिक आवश्यकता का पालन हुआ या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यही था कि ऐसी स्थिति में आरोपी को उसी मामले में दोबारा गिरफ्तार करने के लिए जांच एजेंसी को किन शर्तों और प्रक्रिया का पालन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 22(2) में दिए गए सुरक्षा प्रावधानों का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के आधार केवल औपचारिकता नहीं हैं। आरोपी को यह जानने का अधिकार है कि उसे किस आधार पर गिरफ्तार किया गया है। अदालत ने गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद यदि संवैधानिक या कानूनी उल्लंघन के कारण उसे रिहा किया जाता है, तो जांच एजेंसी केवल उसी आधार पर स्वतः उसे दोबारा हिरासत में नहीं ले सकती। यदि जांच के लिए आरोपी की कस्टोडियल इंटरोगेशन आवश्यक मानी जाती है, तो संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
गंभीर अपराध होने से संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं होते
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी अपराध की गंभीरता संविधान द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों को समाप्त नहीं करती। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कानून के मुताबिक ही अंकुश लगाया जा सकता है और संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई
मामले में गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराने को लेकर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी शुरू की गई थी। सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि संबंधित जांच अधिकारी को निलंबित किया गया और थाना प्रभारी को पद से हटाकर पुलिस लाइन में स्थानांतरित किया गया।
हाईकोर्ट का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 29 मई 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि जांच एजेंसी आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक समझती है, तो उसे Mihir Rajesh Shah मामले में निर्धारित सिद्धांतों और वर्तमान फैसले में बताई गई प्रक्रिया का पालन करना होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ लगाए गए मूल आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल तथा राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने का निर्देश भी दिया है।
फैसला: Jaskaran Jeet Singh Deol v. State of Punjab, Criminal Appeal No. 4234 of 2026, निर्णय दिनांक 21 सितंबर 2026.
