नई दिल्ली // दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके की तीन मस्जिदों को वक्फ संपत्ति घोषित करने की 1980 की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि लगभग 46 साल पहले जारी की गई किसी भी अधिसूचना को तुच्छ आधारों पर चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता संगठन सेव इंडिया फाउंडेशन ने अनावश्यक रूप से अतीत को कुरेदने का प्रयास किया है। याचिका न तो जनहित, न ही नेक इरादे से दायर की गई है। उच्च न्यायालय ने कहा कि रिट याचिका दायर करने के पीछे का उद्देश्य भी नेक इरादे से नहीं लगता है। सेव इंडिया फाउंडेशन ने 2024 से 2026 के बीच 37 जनहित याचिकाएं दाखिल की हैं।
जामा मस्जिद, मोती मस्जिद और मस्जिद जहांगीरपुरी को वक्फ संपत्ति घोषित किया था
याचिका में दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से 10 अप्रैल 1980 के नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील उमेश शर्मा ने कहा कि 1980 के नोटिफिकेशन में जहांगीरपुर के जामा मस्जिद, मोती मस्जिद और मस्जिद जहांगीरपुरी को वक्फ संपत्ति घोषित किया था। याचिका में कहा गया था कि ये तीनों मस्जिद जहां स्थित हैं उन्हें 1977 में सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिग्रहित कर लिया था। अधिग्रहण करने के बाद भूमि मालिकों को मुआवजा भी दिया गया था, लेकिन उसके बाद अनाधिकृत तरीके से मस्जिद स्थापित कर दिया गया। ऐसे में उन्हें वक्फ संपत्ति कैसे घोषित की जा सकती है।सुनवाई के दौरान दिल्ली वक्फ बोर्ड ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि वक्फ बोर्ड के कमिश्नर की ओर से पर्याप्त जांच के बाद नोटिफिकेशन जारी किया गया था। वक्फ बोर्ड ने कहा कि वक्फ कानून की धारा 6 के तहत किसी संपत्ति को वक्फ करार देने के एक साल के अंदर ही उसे किसी दीवानी अदालत में चुनौती देनी होती है और ये 46 साल बाद चुनौती दी गई है।
