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सात वर्ष आठ माह जेल में रहने के बाद हाई कोर्ट से मिली राहत

सिर्फ नक्सली की पत्नी होना दोष सिद्ध करने का आधार नहीं : झारखंड हाईकोर्ट

रांची | BKD News Jharkhand

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झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सिर्फ किसी नक्सली की पत्नी होना किसी व्यक्ति को अपराधी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि के लिए ठोस, विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य आवश्यक हैं।

2004 के गुमला मुठभेड़ मामले में बड़ा फैसला

यह मामला वर्ष 2004 में गुमला जिले के बिशुनपुर थाना क्षेत्र के निनगर गांव में पुलिस और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ से जुड़ा है। पुलिस ने दावा किया था कि मुठभेड़ में दो नक्सली मारे गए थे। इस मामले में प्रमिला देवी को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा चलाया गया था।

हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला किया रद्द

झारखंड हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि प्रमिला देवी प्रतिबंधित नक्सली संगठन की सक्रिय सदस्य थीं। अदालत ने कहा कि उनके पास से कोई हथियार, विस्फोटक या अन्य आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद नहीं हुई थी। केवल घटनास्थल पर मौजूद होना या किसी नक्सली की पत्नी होना अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

सात वर्ष आठ माह जेल में रहने के बाद मिली राहत

निचली अदालत ने वर्ष 2007 में प्रमिला देवी को दोषी ठहराते हुए आठ वर्ष की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए दोषसिद्धि और सजा दोनों को निरस्त कर दिया। उल्लेखनीय है कि प्रमिला देवी इस मामले में लगभग 7 वर्ष 8 माह जेल में रह चुकी थीं।

BKD News Jharkhand विश्लेषण

यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति के पारिवारिक संबंध या सामाजिक पहचान के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसके खिलाफ ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न हों।

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