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सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर अगली सुनवाई 26 को -

सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर अगली सुनवाई 26 को

नई दिल्ली // उच्चतम न्यायालय ने लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी अंजलि की ओर से गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई 26 फरवरी तक टाल दी है। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने आज की सुनवाई सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता के उपलब्ध नहीं होने की वजह से टाली।

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अंजलि ने 19 फरवरी को उच्चतम न्यायालय से कहा था कि जिन चार वीडियो के आधार पर गिरफ्तार किया गया वो वीडियो सोनम वांगचुक को दिखाया ही नहीं गया। केवल पेन ड्राईव में थंबनेल दिखाया गया और उसे प्ले नहीं किया गया। सुनवाई के दौरान सोनम वांगचुक के वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि वीडियो उपलब्ध नहीं कराना अधिकारों का उल्लंघन है। बिना वीडियो देखे सलाहकार बोर्ड और सरकार के समक्ष कोई अपनी बात कैसे रख सकता है। उन्होंने कहा था कि डीआईजी एक लैपटॉप के साथ आए और चार वीडियो बताया गया। सोमन वांगचुक को 5 अक्टूबर, 2025 को लैपटॉप उपलब्ध कराया गया जिसमें चारो वीडियो नहीं थे, केवल थंबनेल दिखाया गया। इस पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज ने कहा कि एक वीडियो है जिसमें सोनम वांगचुक और डीआईजी के बीच बातचीत हो रही है।

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उस वीडियो में सब खुलासा हो जाएगा।उच्चतम न्यायालय ने 16 फरवरी को जोधपुर जेल प्रशासन को निर्देश दिया था कि वो सोनम वांगचुक को हिरासत के दौरान दी गई पेन ड्राईव सीलबंद कर कोर्ट में दाखिल करें। उच्चतम न्यायालय ने इस बात का संदेह जताया था कि केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक के भाषणों से संबंधित जो ट्रांसक्रिप्ट दी है उसके अनुवाद में काफी फर्क है।

सुनवाई के दौरान 8 जनवरी को वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चौरी-चौरा कांड का जिक्र करते हुए कहा था कि हिंसा के बाद सोनम वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल तत्काल वापस ले लिया था। आपको याद होगा कि गांधीजी ने भी ऐसा ही किया था। जब चौरी-चौरा की घटना के बाद हिंसा हुई थी, तो उन्होंने भी बिल्कुल वैसा ही किया था। सिब्बल ने कहा कि हिरासत में लेने के 28 दिन बाद उनको हिरासत में लेने के आधार बताए गए जो कानूनी समय-सीमा का साफ उल्लंघन है। सिब्बल ने कहा कि कानून यह है कि जिन दस्तावेजों के आधार पर हिरासत में लिया गया है अगर आरोपी को उपलब्ध नहीं किया जाता है, तो हिरासत का आदेश रद्द हो जाता है। उच्चतम न्यायालय ने अपने कई फैसलों में यह बात कही है।

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